Skip to main content

Supreme Court Judgments February 2026

भारतीय संविधान में दिए गए नागरिकों के मूल कर्तव्य (the fundamental duties of citizen given in constitution of India and their importance)

 

भारतीय संविधान में दिए गए नागरिकों के मूल कर्तव्य (fundamental duties of citizen given in Indian Constitution)


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 ( क)


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 का के अनुसार अधिकार और कर्तव्य दोनों एक दूसरे के सहवर्ती है। दोनों में चोली दामन का साथ है को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है कि एक के बिना दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती है जहां अधिकार है वही कर्तव्य भी है। एकाधिकार दूसरे का कर्तव्य है। कर्तव्य विहीन अधिकार निरर्थक है विधि में भी यही बात लागू हो होती है। प्रायः प्रत्येक विधि में अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी उल्लेख रहता है इसका भी कारण रहा है भारत एक लंबे समय तक दास्तां की स्थिति में रहा है भारत वासियों की मानसिकता अविकसित रही है और वह हमेशा कर्तव्य पालन में ही रहा है अतः इन परिस्थितियों में संविधान में मात्र अधिकारों का उल्लेख करना ही भारत वासियों के लिए मनोवैज्ञानिक चिकित्सा थी इसका अभिप्राय यह नहीं है कि उस समय भारतवासी कर्तव्यों के लिए तैयार नहीं थी भारत तो हमेशा ही कर्म में विश्वास करता रहा है।


              इसी संदर्भ में यह जान लेना उचित होगा कि विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक संविधान में मूल कर्तव्यों का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है जापान इसका एकमात्र अपवाद है ब्रिटेन कनाडा ऑस्ट्रेलिया अमेरिका आदि देशों में यह common-law अथवा न्यायिक निर्णयों की ही उपज है जबकि साम्यवादी कहे जाने वाले देशों में मूल अधिकारों की अपेक्षा मूल कर्तव्यों पर विशेष बल दिया गया है । रूस के संविधान  में मूल कर्तव्यों का विवेचना मिलती है। वहां प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य माना गया है कि वह

संविधान का पालन करें

देश की विधियों का अनुपालन करें

अनुशासन बनाए रखें

देश की सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें

देश की सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखें


इन मूल कर्तव्य को सभी के लिए अनुकरणीय कहा जा सकता है परंपरा पर हमारे यहां भी संविधान के 42 वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा संविधान में भाग 4 का जोड़ा गया है इसमें नया अनुच्छेद 51 का अंत में स्थापित कर भारतीय नागरिकों के कतिपय मूल कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं।


           इन मूल कर्तव्यों के भांग के लिए यद्यपि संविधान में दंड की कोई व्यवस्था नहीं की गई है लेकिन ऐसी व्यवस्था की जा सकती है फिलहाल नैतिक दायित्व है और बल ही इनके पीछे हैं।

       भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह

        संविधान का पालन करें और उसके आदर्श में संस्थान राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें।

        स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले आदर्शों को हृदय में संजीवनी रखे और उनका पालन करें।


            भारत की प्रभुता एकता और अखंडता की रक्षा करें।

           देश की रक्षा करें और आवाज किए जाने पर राष्ट्रीय सेवा करें।

           भारत की सभी लोगों में समानता और बंधुत्व की भावना का निर्माण करें या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो ऐसी परंपराओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हो ।

           हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उनका परीक्षण करें।

           प्राकृतिक पर्यावरण की जिनके अंतर्गत वन्यजीव नदी और अन्य वन्य जीव है रक्षा करें और उसका समर्थन करें तथा प्राणी मात्र के प्रति दया भाव रखें।

          वैज्ञानिक दृष्टिकोण मानवतावाद और ज्ञान और विकास तथा सुधार की भावना का विकास करें।


          सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर है।

         व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले।

         6 वर्ष की आयु से 14 वर्ष की आयु के बालकों के माता-पिता और प्रतिपालक उनके संरक्षण को का यह कर्तव्य होगा कि वह में शिक्षा का अवसर प्रदान करें।
             (अनुच्छेद 51 क)

            सभी मूल कर्तव्य राष्ट्रीय एकता अखंडता पर प्रभुता को ना टूट सकने वाली रखने की प्रेरणा देते हैं नैतिकता और मानवतावाद की रक्षा करने का यह संदेश देते हैं एवं प्राणी मात्र के प्रति दया और करुणा का पाठ पढ़ाते हैं यह राष्ट्रीय एवं मानवीय भावनाओं में उपरोक्त है निजी स्वार्थ से नहीं है.


         प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह......

संविधान का राष्ट्रीय ध्वज का एवं राष्ट्रगान का आदर करें.

राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों का पालन करें.

देश की भारत की एकता अखंडता और प्रभुता एवं वन्यजीव नदी और वन्यजीवों की रक्षा करें.

अपने देश और राष्ट्र तथा नागरिकों की सेवा करें.

स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का धर्म भाषा प्रदेश या वर्ग के आधार पर भेदभाव का त्याग करें.

प्राणी मात्र के प्रति दया भाव रखें.

हिंसा तथा अपराध से दूर है.

सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करें. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करें.

भारत के सभी लोगों में समर सत्ता और सामान भाईचारे की भावना का निर्माण करें.

व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का प्रयास करें.


           राष्ट्रगान का आदर एवं सम्मान का प्रत्येक भारतीय नागरिक का न केवल संविधानिक और तो और नैतिक दायित्व भी है राष्ट्रगान राष्ट्र की संपूर्ण संस्कृति के गौरव का प्रतीक है यह किसी भी धर्म अथवा जाति पर ना तो अपेक्षा करता है और ना ही उपेक्षा करता है. फिर भी खेद है कि आज उसकी संवैधानिक संविधानिक ता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है.


एन आर नारायण मूर्ति बनाम कन्नड़ रक्षण बाकी लारा बेडके:


एन आर नारायण मूर्ति बनाम कन्नड़ रक्षण बाकी मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा यह भी निर्धारित किया गया कि राष्ट्रीय गान का संगम वाद्य यंत्र का संगीत यंत्र द्वारा किया जा सकता है ऐसा किया जाना प्रतिबंधित नहीं है.

           जहां तक स्त्रियों के सम्मान का प्रश्न है भारतीय नारी आज भी अनेक कुरीतियों का शिकार है यह कुरीतियां नारी सम्मान के प्रतिकूल है हम सती प्रथा को ही लेले सती प्रथा को धर्म का अंग माना जाता है और इस अंधविश्वास के पीछे कई स्त्रियां देखते ही देखते अपने पति के साथ चिता में जल कर राख हो जाती हैं क्या यह न्याय उचित है कोई भी सभ्य समाज से निर्वाचित मानने को तैयार नहीं होगा राजस्थान सखियों का गढ़ माना जाता है यहां की राजपूत महिलाओं ने इस प्रथा का अधिक प्रचलन है अभी-अभी दीवार अल्लाह के सती कांड में संपूर्ण मानव समुदाय को झकझोर कर रख दिया है इसकी परिणति हुई राजस्थान सती निवारण अधिनियम 1987 के से. इसमें सती होने की परत में दुष्प्रेरण गौरवान्वित करने आदि को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है और राजस्थान उच्च न्यायालय ने उसे संविधानिक ठहराया है.

                  स्त्रियों के गरिमा के संबंध में मीनू शर्मा बनाम स्टेट का एक महत्वपूर्ण मामला है इसमें दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा यह अभी निर्धारित किया गया है कि अवैध संबंधों को साबित करने के लिए किसी नाबालिक लड़की की साक्ष हेतु समन स्त्रियों की गरिमा का उल्लंघन नहीं है।


के नागराज बनाम स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश का मामला


इसमें आंध्र प्रदेश के नवनिर्वाचित तेलुगू देशम सरकार ने आंध्र प्रदेश नियोजन अध्यादेश पारित कर सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की आयु को 58 से कम करके 55 वर्ष कर दिया था । इस अधिनियम को तर्कपूर्ण ना कहते हुए न्यायालय में चुनौती दी गई जितेन न्यायालय ने इसे स्वीकार नहीं किया बाकी इसका मुख्य उद्देश्य समाज के नवयुवकों का नियोजन का अवसर प्रदान करना था तथा यह निर्णय सरकार द्वारा विचार विमर्श के बाद लिया गया था आता इस निर्णय को न्यायालय द्वारा सही ठहराया गया।

सेंट्रल इनलैंड वॉटर ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन बनाम बीएन गांगुली का मामला


इस मामले में यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया कि जहां किसी व्यक्ति को 3 माह की नोटिस देकर या 3 माह का वेतन देकर सेवा से पृथक किया जाने की व्यवस्था हो वहां इसे तब तक संविधानिक नहीं माना जा सकता जब तक उसे कारण बताते हुए सुनवाई का अवसर प्रदान नहीं कर दिया जाता है सुनवाई का अवसर दिए बिना किसी स्थाई कर्मचारी को सेवा से पृथक कर देना एक अन्याय पूर्ण निर्णय की न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

फ्रैंक एंथोनी पब्लिक स्कूल एंप्लाइज एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य का मामला

समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत पर आधारित यह एक महत्वपूर्ण मामला है इसमें दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट के उन प्रावधानों को असंवैधानिक करार दे दिया गया जो वेतन सेवा मुक्ति पदोन्नति पदच्युत पद्मावती एवं अन्य सेवा शर्तों के बारे में सरकारी सहायता प्राप्त एवं गैर सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं के अध्यापकों के साथ भेदभाव करने वाले हैं।


परवेज अहमद और अन्य अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और अन्य का मामला


इसमें अभियांत्रिकी पाठ्यक्रमों में कुछ विद्यार्थियों को परीक्षा में बैठने से इसलिए रोक दिया गया क्योंकि उनकी उपस्थिति कम थी जबकि ऐसे ही कुछ विद्यार्थियों को परीक्षा में इसलिए बैठने दिया गया क्योंकि उनकी उपस्थिति में छूट देने वाली समिति द्वारा अनुमति प्रदान कर दी गई थी उपस्थिति में छूट देने की शक्ति विवेकाधीन थी उच्च न्यायालय ने इसे भेदभाव पूर्ण माना और निर्देश दिया कि सभी विद्यार्थियों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाए।


नेनमल और अन्य बनाम कानमल और अन्य का मामला

इस मामले में अभी निर्धारित किया गया कि राजस्थान हक सफा अधिनियम की धारा 6(1) असंवैधानिक है क्योंकि वह किसी व्यक्ति को मात्र पड़ोसी होने के नाते हक सफा अधिकार प्रदान करती है मुझे 14 एवं 15 का उल्लंघन करती है हकसफा के लिए 3 बातें आवश्यक।

संपत्ति के उपयोग उपभोग का प्रभावित होना।

संपत्ति का प्रबंध संयुक्त अथवा सामूहिक होना।

संपत्ति में किसी अजनबी व्यक्ति का हस्तक्षेप हो जाना।।

Comments

Popular posts from this blog

असामी कौन है ?असामी के क्या अधिकार है और दायित्व who is Asami ?discuss the right and liabilities of Assami

अधिनियम की नवीन व्यवस्था के अनुसार आसामी तीसरे प्रकार की भूधृति है। जोतदारो की यह तुच्छ किस्म है।आसामी का भूमि पर अधिकार वंशानुगत   होता है ।उसका हक ना तो स्थाई है और ना संकृम्य ।निम्नलिखित  व्यक्ति अधिनियम के अंतर्गत आसामी हो गए (1)सीर या खुदकाश्त भूमि का गुजारेदार  (2)ठेकेदार  की निजी जोत मे सीर या खुदकाश्त  भूमि  (3) जमींदार  की बाग भूमि का गैरदखीलकार काश्तकार  (4)बाग भूमि का का शिकमी कास्तकार  (5)काशतकार भोग बंधकी  (6) पृत्येक व्यक्ति इस अधिनियम के उपबंध के अनुसार भूमिधर या सीरदार के द्वारा जोत में शामिल भूमि के ठेकेदार के रूप में ग्रहण किया जाएगा।           वास्तव में राज्य में सबसे कम भूमि आसामी जोतदार के पास है उनकी संख्या भी नगण्य है आसामी या तो वे लोग हैं जिनका दाखिला द्वारा उस भूमि पर किया गया है जिस पर असंक्रम्य अधिकार वाले भूमिधरी अधिकार प्राप्त नहीं हो सकते हैं अथवा वे लोग हैं जिन्हें अधिनियम के अनुसार भूमिधर ने अपनी जोत गत भूमि लगान पर उठा दिए इस प्रकार कोई व्यक्ति या तो अक्षम भूमिधर का आसामी होता ह...

बलवा और दंगा क्या होता है? दोनों में क्या अंतर है? दोनों में सजा का क्या प्रावधान है?( what is the riot and Affray. What is the difference between boths.)

बल्बा(Riot):- भारतीय दंड संहिता की धारा 146 के अनुसार यह विधि विरुद्ध जमाव द्वारा ऐसे जमाव के समान उद्देश्य को अग्रसर करने के लिए बल या हिंसा का प्रयोग किया जाता है तो ऐसे जमाव का हर सदस्य बल्बा करने के लिए दोषी होता है।बल्वे के लिए निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक है:- (1) 5 या अधिक व्यक्तियों का विधि विरुद्ध जमाव निर्मित होना चाहिए  (2) वे किसी सामान्य  उद्देश्य से प्रेरित हो (3) उन्होंने आशयित सामान्य  उद्देश्य की पूर्ति हेतु कार्यवाही प्रारंभ कर दी हो (4) उस अवैध जमाव ने या उसके किसी सदस्य द्वारा बल या हिंसा का प्रयोग किया गया हो; (5) ऐसे बल या हिंसा का प्रयोग सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया हो।         अतः बल्वे के लिए आवश्यक है कि जमाव को उद्देश्य विधि विरुद्ध होना चाहिए। यदि जमाव का उद्देश्य विधि विरुद्ध ना हो तो भले ही उसमें बल का प्रयोग किया गया हो वह बलवा नहीं माना जाएगा। किसी विधि विरुद्ध जमाव के सदस्य द्वारा केवल बल का प्रयोग किए जाने मात्र से जमाव के सदस्य अपराधी नहीं माने जाएंगे जब तक यह साबित ना कर दिया जाए कि बल का प्रयोग कि...

पार्षद अंतर नियम से आशय एवं परिभाषा( meaning and definition of article of association)

कंपनी के नियमन के लिए दूसरा आवश्यक दस्तावेज( document) इसके पार्षद अंतर नियम( article of association) होते हैं. कंपनी के आंतरिक प्रबंध के लिए बनाई गई नियमावली को ही अंतर नियम( articles of association) कहा जाता है. यह नियम कंपनी तथा उसके साथियों दोनों के लिए ही बंधन कारी होते हैं. कंपनी की संपूर्ण प्रबंध व्यवस्था उसके अंतर नियम के अनुसार होती है. दूसरे शब्दों में अंतर नियमों में उल्लेख रहता है कि कंपनी कौन-कौन से कार्य किस प्रकार किए जाएंगे तथा उसके विभिन्न पदाधिकारियों या प्रबंधकों के क्या अधिकार होंगे?          कंपनी अधिनियम 2013 की धारा2(5) के अनुसार पार्षद अंतर नियम( article of association) का आशय किसी कंपनी की ऐसी नियमावली से है कि पुरानी कंपनी विधियां मूल रूप से बनाई गई हो अथवा संशोधित की गई हो.              लार्ड केयन्स(Lord Cairns) के अनुसार अंतर नियम पार्षद सीमा नियम के अधीन कार्य करते हैं और वे सीमा नियम को चार्टर के रूप में स्वीकार करते हैं. वे उन नीतियों तथा स्वरूपों को स्पष्ट करते हैं जिनके अनुसार कंपनी...